अद्वितीय परम्परा है ढोकरे पर धनुष-बाण से निशाना साधना 

 


गोपाल रावत।   
बड़कोट। समेश्वर महाराज के मेले में ढोकरे पर निशाना साधने की अद्वितीय परम्परा देखने को मिलती है। समेश्वर महाराज के तीन दिवसीय मेले में ढोकरे का प्रथम दिवस होता हैं। इसके दूसरे दिन समेश्वर महाराज के पाश्वा तेज धार की कुल्हाड़ी पर चलते हैं।    
    विकासखंड नौगांव के थान-नगांण गांव में हर वर्ष जेष्ट माह के संक्रांति पर दुनियां की एक अगल परम्परा देखने को मिलती है। यहां भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम के पिता ऋषि यमदग्नि का आश्रम है, जिनके सानिध्य में समेश्वर महाराज रहते हैं। समेश्वर महाराज के तीन दिवसीय मेले में रोटी का विशाल स्वरूप बनाया जाता है जिसे ढोकरा नाम दिया गया है। इसके लिए थोक के आठ गांव से आटा इक्कठा किया जाता है। समेश्वर महाराज ने इस पर निशाना साधने के लिए सुकण गांव को चुना हुआ है। जेष्ट माह की संक्रांति को ढोकरा बना कर तैयार किया जाता है, जिसको लकड़ी के लम्बें खंबे पर बांधा जाता है। समेश्वर महाराज की पालकी द्वारा तय की गई दूरी से सुकण गांव के युवक धनुष बाण से ढोकरे पर निशाना साधते हैं। ढोकरे पर निशाना लगने के बाद श्री यमदग्नि महाराज एवं समेश्वर महाराज की पूजा विधिविधान से की जाती है। इसके साथ ही दूसरे दिन समेश्वर महाराज के पाश्वा स्थानीय पोखू देवता के पाश्वा तेज धार की कुल्हाड़ी पर चलते हैं जाकि एक चमत्कारिक दृष्य होता है। इस मेले में क्षेत्र के साथ-साथ दूर दराज के लोग पहुंच कर मेले का आनंद लेते हैं और यमदग्नि ऋषि जी का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।  


तेज धर की कुल्हाड़ी पर चलते हैं समेश्वर और पोखू देवता के पाश्वा।  


विशालकाय रोटी को कहा जाता है ढोकरा।  


जेष्ट माह की संक्रांति से होता है श्री यमदग्नि ऋषि आश्रम तीन दिवसीय मेला। 


 


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